हनुमत स्तवन (श्लोक 6)
हनुमत स्तवन श्लोक 6 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
उलंघ्यसिन्धो: सलिलं सलिलं य: शोकवह्नींजनकात्मज जाया।
तादाय तैनेव ददाहलंका नमामि तं प्रांजलि रांजनेयम।
श्लोक का अर्थ (शब्दार्थ)
उलंघ्यसिन्धो: सलिलं सलिलं – समुद्र के जल को पार करते हुए (एक-एक जल बिंदु को लांघते हुए)
य: – जो (हनुमान)
शोकवह्निं जनकात्मज जाया – सीता (जनक की पुत्री, राम की पत्नी) के शोकरूपी अग्नि को
तादाय तैनेव – उसी (शोकरूपी अग्नि) को लेकर
ददाह लंका – लंका को जला दिया
नमामि तं प्रांजलि रांजनेयम् – मैं उस अंजनिपुत्र हनुमान को हाथ जोड़कर नमन करता हूँ
भावार्थ (सरल भाषा में)
यह श्लोक हनुमानजी की असीम शक्ति और भक्ति का वर्णन करता है।
समुद्र लांघना: हनुमान जी ने समुद्र के जल को पार किया, एक-एक बूंद को लांघते हुए सीता माता की खोज में लंका पहुँचे।
सीता का शोक: सीता माता रावण की कैद में थीं और उनके मन में राम के वियोग से भयंकर शोकरूपी अग्नि (दुःख की आग) धधक रही थी।
शोक की आग का उपयोग: हनुमान जी सिर्फ सीता माता की खोज ही नहीं कर रहे थे, बल्कि उनके शोक को भी अपने साथ ले गए। यह शोक ही आग की तरह था।
लंका दहन: जब रावण ने हनुमान जी का अपमान किया, तो उन्होंने अपनी पूँछ में आग लगाकर लंका को जला दिया। यह आग सीता माता के शोक की अग्नि का ही प्रतीक है।
प्रणाम: श्लोक के अंत में भक्त हनुमान जी को हाथ जोड़कर नमन करता है।
विस्तृत विवेचन
भक्ति और कर्तव्य की भावना:
हनुमान जी ने अपने प्रभु श्रीराम के लिए असंभव से दिखने वाले कार्य (समुद्र पार करना) को भी सहजता से कर दिखाया। यह उनकी अटूट भक्ति और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है।
शोक की अग्नि का प्रतीक:
सीता माता का शोक एक अग्नि के समान है, जो हनुमान जी के माध्यम से लंका तक पहुँचती है। यह अग्नि अधर्म और अन्याय के विरुद्ध आक्रोश का प्रतीक है।
अधर्म का विनाश:
लंका दहन सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि अधर्म और अहंकार के विनाश का प्रतीक है। हनुमान जी ने अपनी शक्ति से अधर्मी रावण को चेतावनी दी कि अधर्म का अंत निश्चित है।
भक्त की दृष्टि में हनुमान:
भक्त हनुमान जी को प्रणाम करके उनकी शक्ति, भक्ति और निष्ठा का वंदन करता है। यह श्लोक हनुमान जी की महिमा को बताता है और भक्तों को उनकी शरण लेने की प्रेरणा देता है।
सारांश
यह श्लोक हनुमान जी की अद्भुत शक्ति, भक्ति और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है। सीता माता के शोक को अपने साथ ले जाकर हनुमान जी ने लंका दहन किया, जो अधर्म के विनाश का प्रतीक है। भक्त हनुमान जी को प्रणाम करके उनकी महिमा का गुणगान करता है।
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