हनुमत स्तवन (श्लोक 9)
हनुमत स्तवन श्लोक 9 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
श्लोक:
आञ्जनेयमतिपाटलाननं काञ्चनाद्रिकमनीय विग्रहम्।
पारिजाततरूमूल वासिनं भावयामि पवमाननंदनम्॥
भावार्थ:
मैं उस हनुमान जी का ध्यान करता हूँ, जो माता अंजना के पुत्र हैं (आञ्जनेय), जिनका मुख गुलाब के फूल की तरह लालिमा से भरा है (मतिपाटलाननं), और जिनका शरीर सोने के पहाड़ के समान चमकदार और सुंदर है (काञ्चनाद्रिकमनीय विग्रहम्)। वे उस पारिजात वृक्ष की जड़ के नीचे निवास करते हैं (पारिजाततरूमूल वासिनं), जो सभी वरदान देने वाले और सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले हैं (भावयामि पवमाननंदनम्)। यहाँ पवन के पुत्र हनुमान जी का स्मरण कर उनकी महिमा का ध्यान किया जा रहा है।
विस्तृत विवेचन:
आञ्जनेयमतिपाटलाननं: अंजनी माता के पुत्र हनुमान जी का मुख गुलाब के फूल की तरह लाल और सुंदर है। यह उनकी दिव्य रूप-रंग की ओर संकेत करता है, जो उनकी पवित्रता और शक्ति को दर्शाता है।
काञ्चनाद्रिकमनीय विग्रहम्: उनका शरीर सोने के पहाड़ जैसा चमकीला और आकर्षक है, जो उनकी अपार शक्ति, तेज और दिव्यता का प्रतीक है।
पारिजाततरूमूल वासिनं: पारिजात वृक्ष, जो स्वर्गीय और दिव्य माना जाता है, उसकी जड़ के नीचे निवास करना उनकी दिव्य उपस्थिति और स्थिरता को दर्शाता है। यह भी संकेत है कि वे सभी वरदानों के स्वामी हैं।
भावयामि पवमाननंदनम्: 'पवन' के पुत्र होने के नाते वे वायु के तेजस्वी और आनंददायक पुत्र हैं, जो भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं और संकट हरते हैं।
यह श्लोक हनुमान जी की दिव्यता, सौंदर्य, शक्ति और भक्तों के प्रति उनकी कृपा को संक्षेप में प्रस्तुत करता है। इसका पाठ करने से हनुमान जी की कृपा बनी रहती है और भक्तों को मानसिक शांति, सुरक्षा एवं सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है
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