हनुमत स्तवन (श्लोक 5)

 हनुमत स्तवन श्लोक 5 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

श्लोक:

अंजनानंदनंवीरं 

अंजनानंदनंवीरं जानकीशोकनाशनं।

कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लंकाभयंकरं॥

भावार्थ (अर्थ):

मैं उन अंजनी के वीर पुत्र हनुमान जी को प्रणाम करता हूँ, जो माता जानकी (सीता) के शोक को दूर करने वाले हैं, वानरों के स्वामी हैं, रावण के पुत्र अक्षकुमार का वध करने वाले हैं और लंका के लिए भय का कारण हैं।

विस्तृत विवेचन

अंजनानंदन: अंजनी माता के पुत्र, अर्थात हनुमान।

वीरं: वीरता से भरपूर, साहसी।

भाव: हनुमान जी अंजनी माता के पुत्र हैं और अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध हैं।

जानकीशोकनाशनं

जानकी: सीता माता।

शोकनाशनं: शोक को दूर करने वाले।

भाव: हनुमान जी ने सीता माता के शोक को दूर किया, जब वे लंका में बंदी थीं।

कपीशमक्षहन्तारं

कपीश: वानरों के स्वामी।

अक्षहन्तारं: अक्षकुमार (रावण के पुत्र) का वध करने वाले।

भाव: हनुमान जी वानरों के राजा हैं और उन्होंने रावण के पुत्र अक्षकुमार का वध किया।

वन्दे लंकाभयंकरं

वन्दे: मैं नमस्कार करता हूँ।

लंकाभयंकरं: लंका के लिए भय उत्पन्न करने वाले।

भाव: हनुमान जी ने लंका में जाकर राक्षसों के मन में भय उत्पन्न किया।

सारांश

इस श्लोक में हनुमान जी को उनकी वीरता, भक्ति, साहस, बुद्धिमत्ता और उनके द्वारा किए गए अद्भुत कार्यों के लिए स्मरण किया गया है। वे माता सीता के शोक को दूर करने वाले, वानरों के राजा, रावण के पुत्र अक्षकुमार का वध करने वाले और लंका के लिए भयकारक हैं। यह श्लोक हनुमान जी की महिमा का गुणगान करता है और उनकी शरण में जाने का आह्वान करता है।

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