हनुमत स्तवन (श्लोक 3)

 हनुमत स्तवन श्लोक 3 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

“सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि।

1. शब्दार्थ

सकलगुणनिधानम् — सभी गुणों का खजाना।

वानराणामधीशम् — वानरों के स्वामी।

रघुपति प्रिय भक्तम् — रघुपति (श्रीराम) के प्रिय भक्त।

वातजातम् — वायु (पवन) से उत्पन्न, अर्थात् हनुमान।

नमामि — मैं नमन करता हूँ।

2. भावार्थ

इस श्लोक के माध्यम से भक्त हनुमान जी को नमन करते हुए उनके महान गुणों और शक्तियों का वर्णन कर रहा है।

अर्थ:

“मैं उस सभी गुणों के भंडार, वानरों के स्वामी, श्रीराम के प्रिय भक्त और पवन पुत्र हनुमान को नमन करता हूँ।”

3. विस्तृत विवेचन

3.1. सकलगुणनिधानम्

हनुमान जी में सभी दिव्य गुणों का भंडार है।

वे बुद्धिमान, वीर, निर्भय, विनम्र, सेवाभावी, भक्त और सत्यवादी हैं।

उनकी विविध गुणों के कारण ही वे भक्तों के लिए आदर्श हैं।

3.2. वानराणामधीशम्

हनुमान जी को वानरों का स्वामी कहा गया है।

रामायण में वे वानर सेना के प्रमुख और सर्वश्रेष्ठ वीर थे।

उनके नेतृत्व में ही वानर सेना ने लंका पर विजय प्राप्त की।

3.3. रघुपति प्रिय भक्तम्

हनुमान जी श्रीराम के परम प्रिय भक्त हैं।

उनकी भक्ति, निष्ठा और सेवा से श्रीराम अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

हनुमान जी की भक्ति आज भी भक्तों के लिए प्रेरणा है।

3.4. वातजातम्

हनुमान जी को पवन पुत्र कहा जाता है।

इसका अर्थ है कि वे वायु देवता के पुत्र हैं।

इसी कारण उनमें असीम शक्ति, गति और अद्वितीय क्षमता है।

3.5. नमामि

अंत में भक्त हनुमान जी को नमन करता है।

यह नमन सिर्फ श्रद्धा का नहीं, बल्कि उनके गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प भी है।

4. निष्कर्ष

इस श्लोक के माध्यम से हनुमान जी के गुणों, उनकी शक्ति, नेतृत्व क्षमता और भक्ति की महिमा का वर्णन किया गया है।

यह श्लोक भक्तों को हनुमान जी की शरण में जाने और उनके गुणों को अपनाने की प्रेरणा देता है।

सारांश:

“सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि।”

इसका अर्थ है कि मैं सभी गुणों के भंडार, वानरों के स्वामी, श्रीराम के प्रिय भक्त और पवन पुत्र हनुमान को नमन करता हूँ।

हनुमान जी का यह स्तुति श्लोक उनकी महिमा और भक्ति का प्रतीक है।

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