हनुमत स्तवन (श्लोक 10)

 हनुमत स्तवन श्लोक 10 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

श्लोक

यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।

वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं राक्षसान्तकम्॥

शब्दार्थ

यत्र यत्र: जहाँ-जहाँ

रघुनाथकीर्तनम्: रघुनाथ (श्रीराम) का कीर्तन (गुणगान, नाम जप)

तत्र तत्र: वहाँ-वहाँ

कृतमस्तकाञ्जलिम्: सिर झुकाकर (प्रणाम करके)

वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनम्: आँखों में आँसुओं से भरा हुआ

मारुतिम्: मारुति (हनुमान जी)

राक्षसान्तकम्: राक्षसों का संहार करने वाले

भावार्थ

"जहाँ-जहाँ भगवान श्रीराम का कीर्तन होता है, वहाँ-वहाँ हनुमान जी सिर झुकाकर, आँखों में आँसू भरे, प्रणाम मुद्रा में विराजमान होते हैं।"

इस श्लोक का भाव यह है कि जहाँ भी श्रीराम का नाम लिया जाता है या उनकी महिमा गाई जाती है, वहाँ हनुमान जी भक्ति-भाव से विगलित होकर, आँसुओं से भरी आँखों के साथ, विनम्रतापूर्वक सिर झुकाकर उपस्थित होते हैं। यह हनुमान जी की श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति और समर्पण को दर्शाता है।

विस्तृत विवेचन

1. भक्ति और समर्पण का प्रतीक

हनुमान जी को भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस श्लोक में उनकी भक्ति का चरम उदाहरण देखने को मिलता है। जहाँ भी श्रीराम का नाम लिया जाता है, हनुमान जी वहाँ आत्मविभोर होकर उपस्थित होते हैं।

2. भावुकता और विनम्रता

हनुमान जी की आँखों में आँसू भर आते हैं, जो उनकी भावुकता और श्रीराम के प्रति अनन्य प्रेम को दर्शाता है। सिर झुकाकर प्रणाम करना उनकी विनम्रता को दिखाता है।

3. राक्षसों का संहारक

हनुमान जी को राक्षसों का संहारक भी कहा गया है, परन्तु श्रीराम के नाम के समक्ष वे पूर्णतः भक्त बन जाते हैं। यह दिखाता है कि शक्ति और वीरता के बावजूद, सच्चा भक्त अपने आराध्य के आगे विनम्र ही रहता है।

4. आध्यात्मिक संदेश

इस श्लोक का आध्यात्मिक संदेश यह है कि सच्ची भक्ति में विनम्रता और भावुकता का होना आवश्यक है। जहाँ भी परमात्मा का नाम लिया जाता है, वहाँ दिव्य शक्तियाँ उपस्थित होती हैं और भक्ति का फल अवश्य मिलता है।

निष्कर्ष

यह श्लोक हनुमान जी की भक्ति, विनम्रता और श्रीराम के प्रति समर्पण को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है। यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति में विनम्रता और भावुकता का होना अनिवार्य है, और जहाँ भी भगवान का नाम लिया जाता है, वहाँ दिव्य शक्तियाँ उपस्थित होती हैं।

"जहाँ भी राम नाम कीर्तन होता है, वहाँ हनुमान जी आँसुओं से भरी आँखों और झुके हुए सिर के साथ उपस्थित होते हैं—यही है भक्ति का सच्चा स्वरूप।"

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