हनुमान आरती (श्लोक 7)

 हनुमान आरती श्लोक 7 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

श्लोक

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।

लाय संजीवन प्राण उबारे।।

यह श्लोक हनुमान जी की आरती से लिया गया है, जिसमें उनके अद्भुत पराक्रम और भक्ति का वर्णन किया गया है।

भावार्थ

इस श्लोक का भावार्थ है—

"जब लक्ष्मण जी मूर्छित (अचेत) होकर भूमि पर पड़े थे, तब हनुमान जी संजीवनी बूटी लाकर उनके प्राणों की रक्षा की।"

विस्तृत विवेचन

1. प्रसंग

यह प्रसंग रामायण के युद्धकांड से संबंधित है। जब रावण के पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) ने लक्ष्मण जी पर शक्तिबाण चलाया, तब वे मूर्छित होकर रणभूमि में गिर पड़े। वैद्यराज सुषेण ने बताया कि केवल हिमालय पर स्थित संजीवनी बूटी ही लक्ष्मण जी को जीवनदान दे सकती है।

2. हनुमान जी का पराक्रम

हनुमान जी ने अपने अद्भुत वेग और शक्ति का परिचय देते हुए, संजीवनी बूटी लाने का संकल्प लिया। वे तुरंत हिमालय पर्वत पर पहुंचे, लेकिन संजीवनी बूटी को पहचान न सके। अतः वे पूरा पर्वत ही उठा लाए। वैद्यराज सुषेण ने उस बूटी से लक्ष्मण जी का उपचार किया, जिससे वे पुनः स्वस्थ हो गए।

3. हनुमान जी की भक्ति

यह प्रसंग हनुमान जी की प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट भक्ति, सेवा-भावना और अद्वितीय साहस का प्रतीक है। उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया। उनके इस कार्य से न केवल लक्ष्मण जी के प्राण बचे, बल्कि श्रीराम और समस्त वानर सेना को भी राहत मिली।

4. प्रतीकात्मक अर्थ

सेवा और समर्पण: हनुमान जी का यह कार्य यह दर्शाता है कि सच्ची सेवा और समर्पण से कोई भी कार्य असंभव नहीं है।

भक्ति की शक्ति: जब भक्त सच्चे मन से अपने आराध्य की सेवा करता है, तो वह असंभव को भी संभव बना सकता है।

संकटमोचन: हनुमान जी को 'संकटमोचन' कहा जाता है, क्योंकि वे हर संकट में अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।

निष्कर्ष

यह श्लोक हनुमान जी के अतुलनीय पराक्रम, भक्ति और सेवा-भावना का सुंदर उदाहरण है। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हमें साहस, भक्ति और सेवा-भावना के साथ कार्य करना चाहिए। हनुमान जी की आराधना से हमें संकटों से उबरने की शक्ति मिलती है।

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