हनुमान आरती (श्लोक 5)

 हनुमान आरती श्लोक 5 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

श्लोक

लंका सो कोट समुद्र सी खाई।

जात पवनसुत बार न लाई।।

भावार्थ

इस श्लोक का अर्थ है:

लंका के चारों ओर समुद्र जैसी गहरी और चौड़ी खाई थी, जो अभेद्य थी। कोई भी साधारण व्यक्ति या योद्धा उस खाई को पार नहीं कर सकता था। लेकिन पवनपुत्र हनुमान जी ने उस कठिनाई को बिना किसी विलंब के, अत्यंत तीव्र गति से पार कर लिया और माता सीता की खोज कर श्रीराम को उनका समाचार दिया।

विस्तृत विवेचन

लंका की सुरक्षा:

रावण की लंका चारों तरफ से समुद्र और ऊँचे परकोटे से घिरी थी, जिसे पार करना लगभग असंभव था। यह लंका की अभेद्यता और रावण की शक्ति का प्रतीक था।

हनुमान जी की वीरता:

हनुमान जी वायु के पुत्र हैं, अतः उनमें अद्भुत शक्ति, चपलता और साहस है। उन्होंने बिना किसी संकोच या देरी के समुद्र जैसी विशाल खाई को पार किया। यह उनकी तेज बुद्धि, अदम्य साहस और प्रभु कार्य के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

समर्पण और गति:

'बार न लाई' का अर्थ है—बिल्कुल भी देर नहीं की। हनुमान जी ने श्रीराम के आदेश को सर्वोपरि मानते हुए तुरंत कार्य को पूरा किया, जिससे उनकी प्रभु भक्ति और कार्यकुशलता प्रकट होती है।

प्रेरणा:

यह श्लोक हमें सिखाता है कि यदि मन में श्रद्धा, साहस और समर्पण हो, तो संसार की सबसे बड़ी बाधा भी पार की जा सकती है। हनुमान जी की तरह हमें भी अपने कर्तव्य और धर्म के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों से घबराना नहीं चाहिए।

सारांश

यह श्लोक हनुमान जी की अद्वितीय शक्ति, बुद्धि, और प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी निष्ठा का सुंदर चित्रण है, जो प्रत्येक भक्त को प्रेरणा देता है कि कठिन से कठिन कार्य भी विश्वास और समर्पण से संभव हो जाता है।

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